अभिव्यक्ति

त्रासदी की कारवाँ के
सप्त व्यूह भेदकर,
हम सतत चलते गए
अड़चनों को तोड़कर ।

ज्ञान की गंगा को अब तक
है भला कोई रोक पाया ?
अभिव्यक्ति में है शक्ति कितनी
है कौन ये जान पाया ?

विविध विषय हैं कलारंगी
है लोकरंजक भित्तियां,
सप्त रंगी इंद्रधनुषी
कैनवस पर लिखित कृतियां ।

कल्पना के पंख लेके
हौसलों के  वितान में,
डुबकियां तुम खूब लगाओ
अभिव्यक्ति की जनधार में।

-स्मिता देवी शुक्ला

Published by kamal shukla

जन्म स्थान- प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश . इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. एवं एम. ए. (हिंदी) , राजर्षि टंडन विश्वविद्यालय से एम. ए. (शिक्षा शास्त्र), फरवरी 2000 से केन्द्रीय विद्यालय संगठन मे स्नातकोत्तर शिक्षक के पद पर कार्यरत।

5 thoughts on “अभिव्यक्ति

  1. त्रासदी के कारवां के
    सप्तव्यूह भेदकर
    ………….
    डुबकियां तुम खूब लगाओ
    अभिव्यक्ति की जनधार में।
    सृजन और कविकर्म के लिए सत्प्रेरित करती सुंदर रूपकों से सुसज्जित सरस व सारगर्भित कविता।
    हार्दिक बधाइयाँ विदुषी सुषमा जी।
    सादर
    राजेश शुक्ल
    के वि क्रमांक 1 कोटा

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  2. त्रासदी के कारवां में
    सप्तव्यूह भेदकर
    …………………..
    डुबकियां तुम खूब लगाओ
    अभिव्यक्ति की जनधार में।
    बहुत सुंदर और प्रेरक कविता विदुषी स्मिता जी।
    सादर
    राजेश शुक्ल
    के वि क्र. 1 कोटा

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