
त्रासदी की कारवाँ के सप्त व्यूह भेदकर, हम सतत चलते गए अड़चनों को तोड़कर । ज्ञान की गंगा को अब तक है भला कोई रोक पाया ? अभिव्यक्ति में है शक्ति कितनी है कौन ये जान पाया ? विविध विषय हैं कलारंगी है लोकरंजक भित्तियां, सप्त रंगी इंद्रधनुषी कैनवस पर लिखित कृतियां । कल्पना के पंख लेके हौसलों के वितान में, डुबकियां तुम खूब लगाओ अभिव्यक्ति की जनधार में।
-स्मिता देवी शुक्ला

भूल सुधार
उत्कृष्ट कविता विदुषी स्मिता जी
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प्रेरणा के लिए साधुवाद
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भूल सुधार
हार्दिक बधाइयाँ विदुषी स्मिता जी
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त्रासदी के कारवां के
सप्तव्यूह भेदकर
………….
डुबकियां तुम खूब लगाओ
अभिव्यक्ति की जनधार में।
सृजन और कविकर्म के लिए सत्प्रेरित करती सुंदर रूपकों से सुसज्जित सरस व सारगर्भित कविता।
हार्दिक बधाइयाँ विदुषी सुषमा जी।
सादर
राजेश शुक्ल
के वि क्रमांक 1 कोटा
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त्रासदी के कारवां में
सप्तव्यूह भेदकर
…………………..
डुबकियां तुम खूब लगाओ
अभिव्यक्ति की जनधार में।
बहुत सुंदर और प्रेरक कविता विदुषी स्मिता जी।
सादर
राजेश शुक्ल
के वि क्र. 1 कोटा
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