राजनीति का पहिया

राजनीति की समय-शिला पर छोर बदलते देखा है । समय की तलहटी के पास पलट कर जब मैं जाता हूँ यक़ीनन शर्म से अपने को घिरा खुद को ही पाता हूँ । मैं कैसे खुद को समझाऊँ कि हम तो मन के सच्चे थे । जो उनके पक्ष में बैठे हमें वे जनप्रिय दिखते थे।Continue reading “राजनीति का पहिया”

नवदीप

दीप या अभिमन्यु हो संघर्ष चारों ओर है युग युग अंधेरा घेरता संघर्ष तो घनघोर है । लड़ना अकेले स्वयं है कोई भी न साथ में आएगा सब आत्म संकट से घिरे सहारा न कोई दे पाएगा । चल रहा है जो युद्ध भीतरी घिरा है जो विकारों से नहीं है शस्त्र साथ में निहत्थाContinue reading “नवदीप”

मेरी हिंदी

तुम कितनी प्यारी सुंदर हो तुमको इसका भान नहीं मुझे लगो अनबुझी पहेली जिसका मुझको पता नहीं । बाजार नहीं तुम संस्कृति हो सपनों का लालित्य हो तुम तुम हो यौवन का संस्कार नव यौवन का संसार हो तुम । तेरे संग हो जाने पर ही मेरा गौरव मान बढ़ा पथरीले जीवन के प्रति क्षणContinue reading “मेरी हिंदी”

सच्चा योग

स्कूल जाते समय, विलंब होने पर चलती गाड़ी में, सामने के शीशे पर सूरज की तेज रोशनी आने पर चकाचौंध से गति बाधित हो गई किसी की सहज हंसी, सामने आई सूरज बोला ! गुस्सा काहे करते हो खुद ही तो देरी से उठते हो । मैने कहा, देखिए देव हमें सुझाव कुछ न देवContinue reading “सच्चा योग”

शिक्षा में बदलाव

दुनिया, दूसरों के अंधेरे पक्ष दिखाती अपनी स्वार्थ वृत्ति को साधती स्वयं को सच कहती है। दशकों पूर्व, शिक्षण से लेकर प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शिक्षण कौशलों एवम तकनीकों में गुरुजनों द्वारा बताया गया कि पढ़ाना त्याग की प्रवृत्ति है इसका जीवन साधु वृत्ति है अगर कर सको चमक दमक, धनाढ्यता, भोग से दूरी स्वीकार्य तभीContinue reading “शिक्षा में बदलाव”

दो मन

ज़िंदगी ! अजीब उतार- चढ़ाव से भरी मेरी समझ के बहुत दूर जिन्हें जाना बहुत करीब से वो आशाओं के बहुत दूर क्षितिज के पार दिखते हैं। मेरा एक दोस्त- नाम है अंतर्मन। निरंतर समझाता है मुझे कुछ न सोचने को अनथक कहता है, लेकिन मायावी मन हठी कुरंग-सा मेरी लगाम के खिलाफ ज़िद करताContinue reading “दो मन”

दोस्त….

बरसात के मौसम में कागज़ की नावों में नाविक यात्री तय करने में, काले चींटों को चढ़ाते समय बचपन की विस्मृत न होने वाली कंचे के खेल की गलियों में ईंटों की रेल बनाने और चलाने में बेधड़क मिलते हैं। स्कूल के दिनों में गृहकार्य करने के अवसरों पे मास्टर की मार से बचाने में,Continue reading “दोस्त….”

ओ विधाता!

शांत क्यों हे सर्व संभव ? तुम कर्तव्यों की इतिश्री कर गए या डर गए इस भीषण आपदा में क्या गरुण ? नहीं सुनाई देती तुम्हें दुनिया की करुण आर्तनाद । अपने कर्तव्यों से मुख क्यों मोड़ रहे अब नहीं रुको, कह दो ब्रह्मांड के सर्वश्रेष्ठ सारथी से अपनी फैलाई गई विश्व व्याप्त त्रासदी केContinue reading “ओ विधाता!”

झूठ क्यों?

छोटी-छोटी, ज़रूरी बातों का पुलिंदा है जिसे आप कहना नहीं चाहते लेकिन मजबूरी वश आप बोलने को तैयार होते हैं किसी की सुरक्षा के लिए, कुशलता एवं शालीनता की रक्षा के वास्ते, चाहे कृष्ण हो या राम यकीनन हम और आप । बच्चे बोलते हैं लालच वश कुछ पाने या छिपाने के लिए लेकिन विपरीतContinue reading “झूठ क्यों?”

बोर्ड के बच्चे

जब कोरोना की दूसरी पीढ़ी ने देश पर नादिरशाही हमला बोला तो सत्ता के प्रतापी लोगों ने बोर्ड परीक्षा रद्द कर डाला बात नेट की दुनिया में फोटान सी फैल गई बहुमत की जनता ने मन की मुराद पाई। मेरे मानस में तब से घोषणा के दिन से, मैं अपने मन को कितना भी समझाContinue reading “बोर्ड के बच्चे”