दुर्दांत पशु नहीं तो और क्या?
अपने मन के मलाल की पूर्ति के लिए,
दूसरों के विचारों के घर में ताकना
अपराध नहीं तो और क्या?
अपने समाज के नियम को
दूसरे देश पर जबरन थोपना,
न मानने पर सख़्ती करना
अपराध नहीं तो और क्या?
तनकर खड़े हुए जन समूह
अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए,
तुम सबक सिखाना चाहो उन्हें ज़िद में
अपराध नहीं तो और क्या ?
कोई तुमसे बढ़ न जाए
इस आशय से प्रतिबंधों की लौह श्रृंखला
डालना गले में कुत्तों जैसी,
ऐसे मुखिया बनने का सपना देखना
अपराध नहीं तो और क्या ?
बड़ा बनने की चाह में
प्रतिद्वंदी को अन्याय पूर्वक,
सज़ा देकर सत्ता का बल दिखाना
अपराध नहीं तो और क्या?
धारिता की क्षमता न होने पर भी
सब कुछ पाने की अधिकारिता
का उद्दंड साहस करना,
अपराध नहीं तो और क्या?
-कमल चन्द्र शुक्ल

…Kalaatmak abhivyakti…..
Jaise aapki baatein dil ko sukoon deti hain.. waise hi aapki likhi hui kavita logon ke dil ko chhoo leti hai….🤗🙏
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बहुत ही सुंदर पंक्तियां
मनमोहक और समाज के विचारों का पर्दाफाश करने वाली
लोगों के अंदर वास्तविकता को प्रदर्शित करने वाली
सच में प्रभावशाली है
आग्रह है ऐसे ही और कुछ पंक्तियां लिखते रहिए
प्रणाम सर 🙏😍
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बहुत सुंदर प्रस्तुति गुरुदेव,
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