मैंने सोचा, तितलियों को देखकर
बहुत बार जांचा
मैने अपने अनुभवों को
बहुत सारी कविताओं में
बाँचा
लेकिन मिला नहीं वह
जिसकी आशा थी
अपितु मंजिल कुछ और दिखी,
जिसमें कहा गया कि
लगाव और प्रेम
समर्पण की खुली अंजुली हैं ,
पानी की स्नेह सिक्त छुवन है.
जहांअभीष्ट की गुंजाइश नहीं,
दबाव की, बंद की हुई
मुट्ठी नही, जिसमें
आज़ादी की इति श्री हो जाती है।
-कमल चन्द्र शुक्ल

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