
हे प्रिय ! तुम क्यों रूठ गए ? दीवारों के पार हो गए अहम् भला क्यों दूषित है द्वंद्व भरा सबका मन क्यों है ? वह नीरज जो पंक में खिलता कभी नहीं आधार भूलता मुझ जैसे को त्यक्त् जानकर क्या बात हुई तुम चले गए मुझको कैसे भूल गए ? जीवन की है डगर कंटीली, जो साथ रहो तो बने रसीली । मदमस्त वसंती दुनिया दिखती, जब संग भ्रमण था मैं आली । प्रिय वे दिन कैसे भूल गए हो ? बचपन ! कितने तुम सुखमय थे, तुममें कितना उल्लास भरा मुट्ठी में मेरे सब कुछ था भले विधाता लिखें लकीरें पता नहीं कब रेती से तुम जाने क्यों चुपके से चले गए ? परिवर्तन भले विकास लिए हो समृद्ध, सुलभ सबका जीवन हो, पर देशबंधु, भ्रातृत्व, मधुरता क्यों इन सबसे विलग हो गए ? ममता, समता की सहानुभूति हमसे बेगाने दूर क्यों हुए ?
-कमल चन्द्र शुक्ल

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खूबसूरत
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अद्भुत गुरुदेव।
अंतर्मन से निकली आपकी कविता मानस पटल पर अनेक संस्मरण ,स्मृतियाँ ,भावनाओं को समेटें हैं।
अतिसुन्दर।।।।
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अद्भुत
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बहुत आभार
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