भूल गये

हे प्रिय ! तुम क्यों रूठ गए ?
दीवारों के पार हो गए
अहम् भला क्यों दूषित है
द्वंद्व भरा सबका मन क्यों है ?
वह नीरज जो पंक में खिलता
कभी नहीं आधार भूलता
मुझ जैसे को त्यक्त् जानकर
क्या बात हुई तुम चले गए
मुझको कैसे भूल गए ?
जीवन की है डगर कंटीली, 
जो साथ रहो तो बने रसीली ।
मदमस्त वसंती दुनिया दिखती,
जब संग भ्रमण था मैं आली ।
प्रिय वे दिन कैसे भूल गए हो ?
बचपन ! कितने तुम सुखमय थे, 
तुममें कितना उल्लास भरा
मुट्ठी में मेरे सब कुछ था
भले विधाता लिखें लकीरें
पता नहीं कब रेती से तुम
जाने क्यों चुपके से चले गए ?
परिवर्तन भले विकास लिए हो
समृद्ध, सुलभ सबका जीवन हो, 
पर देशबंधु, भ्रातृत्व, मधुरता
क्यों इन सबसे विलग हो गए ?
ममता, समता की सहानुभूति
हमसे बेगाने दूर क्यों हुए ?

-कमल चन्द्र शुक्ल

Published by kamal shukla

जन्म स्थान- प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश . इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. एवं एम. ए. (हिंदी) , राजर्षि टंडन विश्वविद्यालय से एम. ए. (शिक्षा शास्त्र), फरवरी 2000 से केन्द्रीय विद्यालय संगठन मे स्नातकोत्तर शिक्षक के पद पर कार्यरत।

5 thoughts on “भूल गये

  1. अद्भुत गुरुदेव।

    अंतर्मन से निकली आपकी कविता मानस पटल पर अनेक संस्मरण ,स्मृतियाँ ,भावनाओं को समेटें हैं।
    अतिसुन्दर।।।।

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