

भीषण दुपहरी के उतरने पर आवास के प्रांगण में सुबह के हंसते हरे पौधे को सिर झुकाए, गुस्से में तप्त देखा, एकाएक शिकायती लहजे में बोला । माना कि गर्मी बहुत है लेकिन आप तो अपनी व्यवस्था में पूरे मस्त हैं ठंडई, नींबू पानी बहुत कुछ तमाम फलाहारी मेरे लिए पानी भी भारी। भूल गए क्या तुम, कोरोना की दूसरी लहर का कहर, ऑक्सीजन की कमी का हल्ला मचाते, भागते शहर दर शहर। और तब, तुम सब जान गए मैं हूं तो ही जीवन है । फिर भी कुछ किया क्या ? मैंने कहा ! क्या ? फिक्र तो बहुत है तुम्हारी लेकिन जलापूर्ति वाले भी आपूर्ति देते हैं जैसे उधारी। दुरंत जीवन शक्ति का पुरोधा : बोला हाजिर जवाब पौधा, मैंने कब कहा कि मुझे सप्लाई वाला ही पानी मिले रसोई, नहाने, कपड़े धोने के बाद का पानी, व्यर्थ ही तो तुम रोज़ बहाते हो कुछ सोचो, रिसायकल करो कि मेरे काम आ जाए। विज्ञान के सिर्फ किताबी कीड़े क्यों बनते हो जनाब , दशरथ मांझी की कहानी तो बहुत सुनाते हो बच्चों को, कभी मिट्टी बचाओ, तो कभी पेड़ लगाओ के अभियान से जुड़ते हो पर पूरे वर्ष में कितने प्रतिशत लगाए पेड़ जीवित बचा पाते हो । जन्म आसान है, आदर्श बात करता सारा जहांन है। असलियत है पालन- पोषण पहाड़ सी चढ़ाई सोचकर किसी का साथ देने की क्या तुमने कसम खाई । संकल्प करो तो परिणाम तक पहुंचना, अन्यथा व्यर्थ है तुम्हारा , पर्यावरण बचाओ का नारा लगाना।
-कमल चन्द्र शुक्ल

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति गुरू जी
सादर प्रणाम
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शानदार
अत्यंत प्रासंगिक, मार्मिक और प्रेरक कविता श्री कमल जीशुक्ल जी।हार्दिक बधाइयाँ!
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