स्त्री तुम

अब मैं तुम्हें किसी की 
सफलता के पीछे का हाथ न कहूं,
त्याग की प्रतिमूर्ति क्यों बोलूं ?
व्यक्त करूँ तुम्हें क्यों ?
ममता प्रेम की अविरल धारा-सी
जो पुत्री, प्रेयसी, बहन, सहचरी 
और माँ की अनुभुति है।
धरा पर बारिश की धूल की 
मृत्तिका की सुगंध-सी मदर टेरेसा या
कर्तव्य पथ से भ्रमित मनु को,
वापस  सद मार्ग पर लाती श्रद्धा
क्योंकि तुलना तो मन की व्यथा है,
कमियों की तरफ संकेत है।
कैंसर प्रसूत, शूल से भी भयंकर,
प्रसव दर्द से गुजरती विश्व हिताय
मात्रित्व् सुख अभिलाषी हो।
हे प्रसन्न वदना !
तुम अनंत गुणी, अपरिमेय हो
तुम्हें जानना खुद की व्याख्या है,
जगत की शक्ति माया का।
सर्वत्र तुम्हारी उपस्थिति
उजाले हो दिन के
या यादें हो जुगनुओं के रात की,
वह सब तुम हो क्योंकि
बिना तुम्हारे हम नहीं, कोई नहीं सर्वत्र।

-कमल चन्द्र शुक्ल

Published by kamal shukla

जन्म स्थान- प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश . इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. एवं एम. ए. (हिंदी) , राजर्षि टंडन विश्वविद्यालय से एम. ए. (शिक्षा शास्त्र), फरवरी 2000 से केन्द्रीय विद्यालय संगठन मे स्नातकोत्तर शिक्षक के पद पर कार्यरत।

One thought on “स्त्री तुम

  1. Happy women’s day👌👌👌👌 बेहतरीन कविता🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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