

अब मैं तुम्हें किसी की सफलता के पीछे का हाथ न कहूं, त्याग की प्रतिमूर्ति क्यों बोलूं ? व्यक्त करूँ तुम्हें क्यों ? ममता प्रेम की अविरल धारा-सी जो पुत्री, प्रेयसी, बहन, सहचरी और माँ की अनुभुति है। धरा पर बारिश की धूल की मृत्तिका की सुगंध-सी मदर टेरेसा या कर्तव्य पथ से भ्रमित मनु को, वापस सद मार्ग पर लाती श्रद्धा क्योंकि तुलना तो मन की व्यथा है, कमियों की तरफ संकेत है। कैंसर प्रसूत, शूल से भी भयंकर, प्रसव दर्द से गुजरती विश्व हिताय मात्रित्व् सुख अभिलाषी हो। हे प्रसन्न वदना ! तुम अनंत गुणी, अपरिमेय हो तुम्हें जानना खुद की व्याख्या है, जगत की शक्ति माया का। सर्वत्र तुम्हारी उपस्थिति उजाले हो दिन के या यादें हो जुगनुओं के रात की, वह सब तुम हो क्योंकि बिना तुम्हारे हम नहीं, कोई नहीं सर्वत्र।
-कमल चन्द्र शुक्ल

Happy women’s day👌👌👌👌 बेहतरीन कविता🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
LikeLike