दिवाली के दिन, उल्लसित उजले मन हाट और मॉल में, लक्ष्मी गणेश के साथ विद्या की अधिष्ठात्री, सरस्वती विषयक सामग्री ले रहे थे। अचानक एक खरीदार ऐश्वर्य युक्त, सुनहरी काष्ठ लेखनी को छोड़, अड़ गया। पेंसिलों को दरकिनार कर अमिताभ विज्ञापित पार्कर पर बहक गया। घटना को घटित होते देख स्वाभिमानी डार्क पेंसि गुस्से में उबल पड़ी। अपना विरोध दर्ज कराने को डिब्बे से निकल पड़ी। कहा, शाही नवाबी, खर्चीले, अभिमानी खानदानी अस्थिर,चापलूस, घमंडी। देखते नही मुझे, सुकोमल हाथों में सोल्लास, बालमन में रची बसी मैं, नर्सरी की अविजित मालकिन खिलखिलाहट का पल-पल अनुपम आनंद उठाती, नए अफसरों को, बार-बार भूल सुधार का मौका देती हुई चलती, नर्म अंगुलियों का मार्ग दर्शन करती सदियों से, छिल छिलकर अंतिम दम तक, निष्ठापूर्वक धरा से निर्वात तक, कर्तव्यों का निर्वहन कर रही हूँ। वैसे तुम्हारा इतराना, मुझे अजीब नहीं लगता, क्योंकि शासन सत्ता की भाँति तुम भी अस्थिर हो, और मैं एक उजले ज्ञान की शुभ्र गंगा सदृश युगों तक दिखने वाली रोशनी हूँ। करती हूं अर्ज, अजेय गुणातीत ईश्वर से, कि तुममे सात्विकता आये और सैय्यद रज़ा, सार्त्र, पिकासो, एम एफ हुसैन की रचनाओं को देख विश्वग्राम की सोसाइटी में नामांकन करवा आओ।

-कमल चन्द्र शुक्ल

असाधारण और उत्कृष्ट कविता
राजेश शुक्ल
के वि क्रमांक 1 कोटा
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