
पता नहीं क्यों, आजकल सत्ता-मद में विश्वस्त पढ़ी लिखी जनता को क्या हो गया है कि हर गली मुहल्ले चौराहे पे आम चर्चा बहस कि, अब कुछ हो रहा है, मंदिर, सड़क सब बन रहे हैं तकनीकी खेती हो रही है, रेल सरपट चल पड़ी है सोच सबकी बढ़ रही है । पहले तो कुछ हुआ ही नहीं किसी ने कुछ किया ही नहीं। जैसे सत्तर सालों से लोग मिट्टी फांक के आबादी बढ़ा रहे थे। हमने पूछा कि भइया क्या पता है माँ कहती थी कि दादी बैलगाड़ी में घर आई थी, और मेरी भाभी पिछले साल बड़ी-सी कार में, महीने भर में वातानुकूलित क्लास में देशाटन पूरा कर आईं । क्या सत्तर साल पहले, शादी व्याह में ऐसी साज, बाज, मनोरंजन भ्रमण, तकनीक, कंप्यूटर, विमान कुछ था देश में चौतीस करोड़ में एक तिहाई रात को बिना कुछ खाए सोने वाले थे। एक नए कपड़े (शादी का जोड़ा) से सभी की शादी का काम हो जाता था। आज सबका पेट भरा, सारी सुख सुविधा से लदे, बिजली घंटे भर की गुल तो जान लो लोकधर्म, संस्कार गायब । हर नई पीढ़ी पुरानी को असभ्य, अकुशल साबित करती है, आधुनिकता परंपरा की विरोधी रही है, सुनने को तैयार रखना अपने को तुम्हारा भी समय आ रहा है।
-कमल चन्द्र शुक्ल

ख़ूब लिखा
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Yours. Appriciation 🙏
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☝️👍👌✌️
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Thanks
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Khoobsurat
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धन्यवाद
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People change with time…… the same happens with the world👏👏👏👏
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Fabulous
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Fantastic poem 👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌 👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌
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