जन-व्यथा

Advertisements
न लगे हमें अब गर्मी,
औे दूर भागी सर्दी |
बंदे जन सब रहे बोल,
ये है भारत बंदी |
		एक महीना बीत गया,
		संक्रमण दिखा है मंद।
		जगत अर्थ रफ्तार की ,
		हो गई है अब चंद।
छुट्टी आतुर कार्मिक,
सिर पे धरे हैं हाथ |
बॉस कहें अब लो मजे,
ब्रंच बनाओ साथ।
		शॉर्ट लीव की बात ही छोड़ो,
		समर ब्रेक हुआ फेल।
		घर जाने की रेल टेल का,
		निकल गया जो तेल।
क्या थे क्या हम बन गए,
मंदी से बढ़ा मलाल।
सब्जी मंडी रो रही,
जनता हुई हलाल।
		परबस भोजन कर रहे,
		आंखेँ थक बदहाल।
		घर - गृह पहुँचन के बरे,
		मनवा बड़ा मलाल।
Photo by energepic.com on Pexels.com

-कमल चन्द्र शुक्ल

Published by kamal shukla

जन्म स्थान- प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश . इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. एवं एम. ए. (हिंदी) , राजर्षि टंडन विश्वविद्यालय से एम. ए. (शिक्षा शास्त्र), फरवरी 2000 से केन्द्रीय विद्यालय संगठन मे स्नातकोत्तर शिक्षक के पद पर कार्यरत।

Leave a comment