Advertisements
न लगे हमें अब गर्मी, औे दूर भागी सर्दी | बंदे जन सब रहे बोल, ये है भारत बंदी | एक महीना बीत गया, संक्रमण दिखा है मंद। जगत अर्थ रफ्तार की , हो गई है अब चंद। छुट्टी आतुर कार्मिक, सिर पे धरे हैं हाथ | बॉस कहें अब लो मजे, ब्रंच बनाओ साथ। शॉर्ट लीव की बात ही छोड़ो, समर ब्रेक हुआ फेल। घर जाने की रेल टेल का, निकल गया जो तेल। क्या थे क्या हम बन गए, मंदी से बढ़ा मलाल। सब्जी मंडी रो रही, जनता हुई हलाल। परबस भोजन कर रहे, आंखेँ थक बदहाल। घर - गृह पहुँचन के बरे, मनवा बड़ा मलाल।

-कमल चन्द्र शुक्ल
